संस्कृत श्लोक
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्।
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्॥
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
शुद्ध हिन्दी अर्थ
- अतुलितबलधामं → जो अपार और अतुलनीय बल के भंडार हैं।
- हेमशैलाभदेहम् → जिनका शरीर स्वर्ण पर्वत (सोनाचल) के समान दीप्तिमान है।
- दनुजवनकृशानुं → जो राक्षस समूह के लिए अग्नि के समान संहारक हैं।
- ज्ञानिनामग्रगण्यम् → जो ज्ञानीजनो में भी अग्रगण्य (सबसे श्रेष्ठ) हैं।
- सकलगुणनिधानं → जो सभी उत्तम गुणों के भंडार हैं।
- वानराणामधीशम् → जो वानरों के स्वामी और प्रमुख हैं।
- रघुपतिप्रियभक्तं → जो श्रीराम (रघुपति) के प्रिय भक्त हैं।
- वातजातं नमामि → उन पवनपुत्र हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ।